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ChatGPT में जाति आधारित पूर्वाग्रह का दावा: UPSC शिक्षक विजेंद्र चौहान के बयान पर विवाद

UPSC educator Vijender Chauhan claims ChatGPT favours Upper-Caste: How UPSC coaching faculties are injecting caste discrimination in education

दिल्ली विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर और प्रसिद्ध UPSC मॉक इंटरव्यूअर डॉ. विजेंद्र सिंह चौहान का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने ChatGPT जैसे AI टूल्स पर 'सवर्ण पूर्वाग्रह' का आरोप लगाया है। यह बयान एक किताब लॉन्च कार्यक्रम के दौरान दिया गया था और तब से तकनीकी समुदाय तथा शिक्षा जगत में गहन बहस छिड़ गई है।

क्या कहा विजेंद्र चौहान ने?

वायरल वीडियो में चौहान ने कहा, "ChatGPT का डेटा बड़े पैमाने पर सवर्ण और विशेषाधिकार प्राप्त समाज के वर्गों द्वारा बनाया गया है। इससे सामाजिक न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती।" Threads उन्होंने यह भी कहा कि ChatGPT (Generative Pre-trained Transformer) को मौजूदा सामग्री पर प्रशिक्षित किया गया है जो सवर्ण और सत्ता में बैठे लोगों का पक्ष लेती है।

चौहान ने आगे कहा कि "यदि किसी मशीन की नींव ही दोषपूर्ण है, तो उससे न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है? इसलिए लड़ाई केवल विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, मुख्यमंत्रियों या नौकरशाहों से नहीं, बल्कि एक एल्गोरिदम से भी है।"

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया

जैसे ही यह वीडियो वायरल हुआ, कई यूज़र्स ने विजेंद्र चौहान पर 'जातिवाद का जहर' फैलाने का आरोप लगाया। OneIndia आलोचकों का तर्क है कि AI एक गणितीय मॉडल है और इसमें जाति ढूंढना अनुचित है।

एक UPSC उम्मीदवार ने सोशल मीडिया पर लिखा, "AI जैसी तटस्थ तकनीक में जाति का कोण लाने से किसी को क्या लाभ? यह 2026 है, और हम अभी भी ऐसे लोगों से निपट रहे हैं जो समुदायों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने वाली कहानियां फैला रहे हैं। UPSC की तैयारी कर रहे किसी व्यक्ति के रूप में, मैं शिक्षकों से उम्मीद करता हूं कि वे हमें एकजुट करें, न कि 'अवलोकन' की आड़ में नफरत फैलाएं।"

बाद में, बढ़ती आलोचना के बाद, चौहान ने एक फॉलो-अप वीडियो में "AI के आंतरिक पूर्वाग्रह" का हवाला देते हुए अपने बयान को "कई अध्ययनों" के आधार पर बताया।

क्या कहता है शोध? तथ्य-जांच

वास्तविकता यह है कि AI में पूर्वाग्रह का मुद्दा वैज्ञानिक शोध का एक गंभीर विषय है, लेकिन यह काफी जटिल है।

शोध निष्कर्ष:

Nature पत्रिका में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि कई AI मॉडल्स भारतीय जाति व्यवस्था से संबंधित हानिकारक रूढ़िवादिता को पुनः उत्पन्न करते हैं। शोधकर्ताओं ने 7,200 से अधिक AI-जनित कहानियों की जांच की और पाया कि प्रमुख समूह जैसे हिंदू और सवर्ण जातियां अधिक प्रतिनिधित्व में थीं, जबकि हाशिए पर पड़े समुदायों का कम प्रतिनिधित्व था।

MIT Technology Review की एक जांच में पाया गया कि OpenAI के उत्पादों में, जिसमें ChatGPT भी शामिल है, जाति पूर्वाग्रह व्याप्त है। GPT-5 और Sora दोनों मॉडल्स में जाति पूर्वाग्रह प्रदर्शित हुआ। 

महत्वपूर्ण बिंदु:

  1. ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा बनाए गए Indian Bias Evaluation Dataset (Indian-BhED) का उपयोग करके परीक्षण किए गए, जो भारत के लिए अनूठे सामाजिक-सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों का परीक्षण करता है। 
  2. Google India की AI इंजीनियर ख्याति खंडेलवाल ने कहा, "मुझे लगता है कि इसका सबसे बड़ा कारण डिजिटल डेटा में समाज के एक बड़े वर्ग के प्रति शुद्ध उदासीनता है, और यह भी कि जातिवाद अभी भी मौजूद है और यह एक दंडनीय अपराध है, इसकी स्वीकृति की कमी है।"
  3. समस्या केवल OpenAI तक सीमित नहीं है। प्रारंभिक शोध बताते हैं कि कुछ ओपन-सोर्स मॉडल्स में जाति पूर्वाग्रह और भी अधिक गंभीर हो सकता है। 

विशेषज्ञों की राय

ScienceDirect में प्रकाशित एक पेपर का तर्क है कि भारत में उभरते AI शासन ढांचे को भारतीय समाज में संरचनात्मक असमानताओं को समझना चाहिए, क्योंकि वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त मॉडलों द्वारा निर्धारित मानक भेदभाव से निपटने के लिए अपर्याप्त हैं।

हालांकि, यह भी पाया गया कि ऐसे उपकरण पहला कदम हैं, लेकिन कम पक्षपाती मॉडल बनाना एक बड़ी चुनौती है।

विवाद का व्यापक संदर्भ

यह पहला मौका नहीं है जब UPSC कोचिंग संस्थानों में विवादास्पद बयान सामने आए हैं। पिछले कुछ वर्षों में, कई शिक्षकों के बयानों पर सवाल उठाए गए हैं, जिन्हें आलोचकों ने विभाजनकारी बताया है।

हालांकि, इस बार का विवाद तकनीक और सामाजिक न्याय के बीच संबंध पर एक महत्वपूर्ण बहस को उजागर करता है।

संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता

तथ्य यह है कि:

  1. AI में पूर्वाग्रह वास्तविक है: वैज्ञानिक शोध स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि AI मॉडल्स में जाति, लिंग, और नस्ल से संबंधित पूर्वाग्रह मौजूद हैं।
  2. यह जटिल मुद्दा है: AI पूर्वाग्रह केवल कोड से नहीं, बल्कि भारत की जाति, वर्ग, लिंग और धार्मिक पदानुक्रम से उत्पन्न होता है।
  3. समाधान की आवश्यकता: शोधकर्ताओं का कहना है कि दलित-बहुजन और आदिवासी विद्वानों, कार्यकर्ताओं और समाजशास्त्रियों के साथ मिलकर काम करना आवश्यक है।

आगे की राह

यह विवाद दो महत्वपूर्ण सवाल उठाता है:

  1. क्या AI वास्तव में तटस्थ हो सकता है, या यह समाज के मौजूदा पूर्वाग्रहों को प्रतिबिंबित करता है?
  2. भारत जैसे विविध समाज में AI का उपयोग कैसे न्यायसंगत और समावेशी बनाया जा सकता है?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान केवल तकनीकी नहीं है, बल्कि सामाजिक, नैतिक और नीतिगत स्तर पर व्यापक प्रयासों की आवश्यकता है।



निष्कर्ष:

विजेंद्र चौहान के बयान ने भले ही विवाद खड़ा किया हो, लेकिन इसने AI में पूर्वाग्रह के वास्तविक मुद्दे पर बहस को आगे बढ़ाया है। हालांकि, शिक्षकों और सार्वजनिक हस्तियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसे संवेदनशील विषयों पर संतुलित और तथ्य-आधारित दृष्टिकोण अपनाएं, जो समाज में विभाजन के बजाय समझ और समाधान को बढ़ावा दे।


नोट: यह लेख उपलब्ध शोध और सार्वजनिक जानकारी पर आधारित है। AI में पूर्वाग्रह एक जारी शोध का विषय है और इस पर निरंतर अध्ययन हो रहे हैं।

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